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अज्ञानता के चलते होने वाले वन्य जीव मानव संघर्ष का परिणाम है

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बेगुनाह वन्यजीवो की मौतें और 
चोर शिकारियों की बढती गतिविधियां

जनपद लखीमपुर खीरी
विश्व प्रसिद्ध दुधवा नेशनल पार्क मे तेजी से बती दुर्लभ वन्य जीवो की संख्या तथा
आये दिन वन्य जीवो के जंगल से बाहर निकल कर खेतो फार्मो मे आशियाना वनाये जाने के चलते ही शायद आये दिन हिंसक वन्यजीवो व इंसानो के बीच होने वाली मुठभेडो के चलते जनता मे फैलता वन्यजीवो के प्रति आक्रोश ही शायद इन दुर्लभ वन्य जीवो के शिकारियो को संरक्छण  दिलाता है
  पिछले वर्षो मे अकेले जनपद लखीमपुर खीरी मे ही विभिन्न इलाको मे वन्य जीव मानव संघर्ष की घटनाओ मे दर्जनो लोगो को अपनी जान गंवानी पडी थी और कई दर्जन लोग घायल हो चुके हैं
पर इसका जिम्मेदार बास्तव मे कौन है सच्चाई तो यही है कि
न हर वन्यजीव मानव भक्छी होता है न ही हर वन्य जीव किसी इंसान को चोट पहुंचाना चाहता है वास्तविकता  यही है कि इसके लिये भी इंसान ही वास्तविक जिम्मेदार है
कभी  जनपद लखीमपुर खीरी जिले मे लगभग हर इलाके मे वन्य जीवन की खूबसूरत बारह सिंगो के सौ सौ के नहीं हजार हजार के झुन्ड अक्सर खेतो के पास चौकडी भरते दिखाई दे जाते थे
बाघ तेंदुये जंगलो मे बडे बडे विशाल बागो मे आसानी से विचरण करते हुये देखे जाते थे
पर एक शतक पूर्व राजे रजवाडो व अंग्रेजो द्वारा किये गये अंधाधुंध शिकार के बाद और अंग्रेजो द्वारा भारत मे रेल लाईनो के विस्तार के लिये आवश्यक स्लीपरों के लिये वनो की अंधाधुंध कटाई के चलते इस इलाके से मानो वन्य जीवन ही विलुप्त प्राय वन कर रह गया था
फिर 1980 के दशक मे प्रसिद्ध शिकारी विली अर्जुन सिंह के अथक प्रयास के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना की गयी और भारत मे ही लगभग मिट चुके बाघो व अन्य दुर्लभ वन्य जीवो को संरक्छन प्रदान कर इनके सम्वर्धन की दिशा मे भागीरथ प्रयास किया गया
इसी प्रयास का परिणाम है कि आज दुधवा नेशनल पार्क अपनी दुर्लभ वन्यजीव श्रंखला मे तेजी से विस्तार करने मे कामयाब हुआ है
और विश्व मे अपना स्थान वना चुका है
परन्तु तेजी से वढने वाले बडे विडाल वंशीय जानवरो बाघ तेंदुआ आदि के अक्सर जंगलो से बाहर निकलने व गन्ने के खेतो मे आशियाना वनाये जाने की पृवत्ति के चलते  वन्यजीव मानव मानव संघर्ष की घटनाये भी तेजी से बढी है
जिसके चलते जंगल से सटे ग्रामीण इलाकों मे लोगो मे इन वन्यजीवो के प्रति डर व नफरत भी बढी है
पिछले दिनो इसी नफरत के चलते मैलानी के पास चलतुआ मे लोगो एक बाघ को पीट पीट कर मार डाला था
और अभी हाल ही मे चार दिन पहले कतरनियां घाट बहराइच मे दहशत जदा लोगो ने
गांव के पास एक तेंदुये को देख कर देखते ही घेर कर पीट पीट कर मार डाला
जिसमे कार्यवाही करते हुये दो लोगो को गिरफ्तार किया था जिनको छुडाने के लिये कई गांवो के आक्रोशित ग्रामीणो की भीड ने पीलीभीत वस्ती मार्ग को जामकर दिया था हार कर प्रसाशन ने जब गिरफ्तार आरोपियो को मुचलके पर छोडा तब जाकर जाम खुला
इस घटना मे पुलिस ने लगभग 400 अज्ञात प्रदर्शन कारियो पर केस दर्ज किया है
इसके पूर्व गत वर्ष महेशपुर रेंज को भी टाइगर हमलो से दहशत जदां ग्रामीणो की आक्रोशित भीड ने न केवल आगजनी कर जला दिया था वल्कि गुस्साये लोगो ने रेंज आफिस मे मौजूद वन कर्मियो की पिटाई भी करदी थी

पर अहम सबाल है कि आखिर कौन है इसका वास्तविक जिम्मेदार

क्या वन्य जीवो की तेजी से बढी संख्या के चलते जंगल का छोटा पडता संकुचित होता वन्य छेत्र
अथवा वन विभाग की कमजोरी या फिर जंगलो मे अबैध इंसानी दखलंदाजी या वन्यजीवो के बारे मे जानकारी का अभाव

बैसे देखा जाये तो दुधवा नेशनल पार्क के बीचों बीच बसा थारू गांव सूरमा शतको से जंगल के अंदर आबाद है और बाघो तेंदुओ का गांव के पास गांव से सटे इलाको को छोडिये गांव के अंदर भी अक्सर आना जाना होने के बाबजूद कभी वन्यजीवो के हमले या बाघो के हमले मे किसी इंसान की मौत की सूचना नहीं दिखाई देती
कुछ समय पूर्व सूरमा गांव के शंकरिया प्रधान ने जानकारी देते हुये बताया था कि हम लोगो ने बाघो जैसे हिंसक जानवरो के साथ रहना सीख लिया है बस थोडी सी साबधानी वरतने की जरूरत है
बैसे महेश पुर की घटना के बाद सक्रिय हुये वन विभाग ने जिले भर मे जंगल के किनारे वसे गांवो मे बाघो से वचाव पर वाकायदा कार्यशाला सेमिनार आदि आयोजित कर लोगो को बाघो जंगली जानवरो की आदतो के बारे मे जानकारी देने का अभियान चला कर वन्यजीव मानव संघर्ष की घटनाओ को कम करने का प्रयास किया था और परिणाम स्वरुप बाघ हमलो की घटनाओ मे कमी भी देखी गयी
और यह प्रयास आज भी जारी है
आज भी बगलहा कुटी मे वन विभाग की टीम ग्रामीणो को तेंदुये के हमले से वचाव करने के तरीको की जानकारी देरही है सूत्रो की माने तो जंगल से सटे गांवो मे बाघ ,जंगली हाथियो ,से वचाव की कार्यशालाये आयोजित करने के परिणोमो से उत्साहित वन विभाग अब तेंदुओं से सुरक्छा के लिये ग्रामीणो को गांवो मे जा कर जागरूक करने के प्रयास मे लगा है ताकि इंसानो और वन्यजीवो के बीच तालमेल बैठ सके और दोनो की सुरक्छा की जा सके
इसी क्रम मे इसी वर्ष कतरनिया घाट वन्यजीव विहार से आये हाथियो के झुन्ड ने निघासन के पास तीन आदमियो को मार डाला था और काफी फसल वर्वाद करदी थी तब वन विभाग ने जंगली हाथी प्रभावित छेत्र मे कई स्थानो पर झारखंड की गजराज परियोजना से आये हाथी विशेषज्ञ डाक्टर आदित्य द्वारा हाथियो से वचाव की कार्यशालाये आयोजित करा कर ग्रामीणो को हाथियो के हमलो से वचाव के टिप्स दिलवा कर ग्रामीणो को जागरूक कराने की कोशिश की थी
हाथियों के आक्रोशित हो कर हमला करने को लेकर पूंछे गये एक सबाल के जबाव मे डा आदित्य ने बताया था कि बास्तव मे हाथियो का झुंड तो वास्तव मे अपने पुराने रास्ते कारीडोर से होकर जाने का प्रयास कर रहा था पर मानव दखल के चलते उनके प्राचीन मार्ग मे तेजी से बढती मानव आवादी मिटते हुये जंगल और घटते जल श्रोतों  के चलते हाथियो के अग्रेसिव होने के कारण ही इस तरह की घटनाये घटतीं है
पर देखा जाये तो वन्यजीव मानव संघर्ष की घटनाओ के लिये वास्तव मे इंसान ही जिम्मेदार है जो प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर को स्वयं मिटाने पर तुला है
और शायद इसी अज्ञानता के चलते ही  मानव व वन्यजीव संघर्ष के परिणाम स्वरूप ही अबैध शिकारियो को पनपने का मौका मिलता है
अब बात करते है पडोसी देश नेपाल की तो पिछले दो माह पूर्व नेपाल के वर्दिया वन्य जीव अभ्यारण्य मे एक युवा बाघ एक तेज रफ्तार कार से टकरा कर जख्मी हो गया था तब यह बताया गया था कि जखमी हुआ बाघ दुधवा नेशनल पार्क मे छोडा गया बाघ है जिसके गले मे ट्रेकिग डिवाइस युक्त कालर लगी है जब नेपाल के सूत्रों से इस बाबत जानकारी ली गयी तो घायल बाघ दुधवा का गायब बाघ तो नहीं निकला पर नेपाल मे भटके हुये बाघो व वन्य जीवो को करेंट लगा कर मारे जाने की घटनाओ  का रहस्यपूर्ण खुलासा अबश्य हुआ
जानकारी के अनुसार भारत के कतर्नियांघाट वन्य जीव अभ्यारण्य से सटे नेपाली वर्दिया छेत्र के गांव गेरुआ के पास खेतो मे करेंट लगा कर बाघ को मारे जाने की घटना प्रकाश मे आयी थी जिसमे शिकारियो ने मृत बाघ को जमीन मे गाड दिया था जिसे जानकारी मिलने पर नेपाली वन विभाग ने जमीन से खोद निकाला था और शिकारियो पर कार्यवाही भी की थी पहले भी इसी छेत्र मे जंगली हाथियो तक को नेपाली ग्रामीणो ने खेतो मे करेंट लगा कर मारा था
नेपाली सूत्रो की माने तो दुधवा से सटे नेपाली छेत्र मे अक्सर वन्य जीव भटक कर मुहाना नदी पार कर आ जाते है जिनके पैरो के निशान देखकर शिकारी उनके छुपने के खेत के पास तारो मे करेंट दौडा देते है जिसके चलते वन्य जीव मारे जाते है और उनके अवशेषो की तस्करी कर दी जाती है कभी कभार ही मामला प्रकाश मे आता है तब नेपाली वन विभाग कार्यवाही भी करता है
पर भारत नेपाल के बीच खुली सीमा के चलते वन्यजीवो का आवागमन जारी रहने से इस इलाके मे चोर शिकारियो व वन्यजीव अंगो के तस्करो की गतिविधियां चोरी छुपे चलती रहती है

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