संस्कृति, परंपरा और कला से होती है देश की पहचान
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कला अभिरुचि पाठ्यक्रम में वक्ताओं ने दिया व्याख्यान
लखनऊ (सं)। राज्य संग्रहालय में कला अभिरुचि पाठ्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में अयोध्या के डॉ. हरि प्रसाद दुबे ने भारतीय कला में संस्कृति के विविध संदर्भ विषय के माध्यम से भारतीय कला में जीवन मूल्यों के साथ साथ संस्कृति के विविध तत्वों को साथ व्याख्यायित किया। उन्होंने बताया कि भारतीय कला जीवन मूल्यों के साथ साथ सामाजिक चेतना की साक्षी रही है। कला के मांगलिक प्रतीक नदियों के घाट भारतीयता के प्राण तत्व हैं। उन्होंने कहा कि पशु पक्षियों के जीवन में भी कलात्मक सौंदर्य बोध समाहित हैं। किसी देश की पहचान सत्ता से नहीं बल्कि संस्कृति, परंपरा, कला, ललित कला और आस्था एवं पर्व से होती है। कला को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने बताया की कला खरीदी और बेची नहीं जा सकती है और यह आत्मीयता के रंग में डुबोती है। उन्होंने आगे बताया कि भारत की सांस्कृतिक पहचान घाटों से जुड़ी हुयी है। भारत के पौराणिक अतीत के साथ इतिहास का भी दुर्लभ दर्शन घाटों में होता है। उन्होंने अंत में कहा कि करुणा के बिना कोई संस्कृति कोई भारतीय कला परिपक्व नहीं होती। हमारी कसौटी पर वही कला खरी उतरेगी जिसमें कुछ चिंतन हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा जीवन की सच्चाई हो। रेनू द्विवेदी के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में निदेशक डॉ. आनन्द कुमार सिंह ने भारतीय कला में संस्कृति के विविध संदर्भ विषय पर विद्यार्थियों को व्याख्यान दिया।
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