भगवान परशुराम जन्मोत्सव भव्यता के साथ मनाया गया
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आदेश शर्मा
लखीमपुर खीरी। परशुराम जन्मोत्सव प्रगतिशील ब्राह्मण महासभा द्वारा ब्राह्मण धर्मशाला में आयोजित किया गया।
सर्व प्रथम सभी व्रम्ह वंधुओं द्वारा भगवान श्री परशुराम का पूजन अर्चन किया गया
तत्पश्चात कार्यक्रम मे आये ब्रम्ह समाज के बिचारकों मनीषियों व देश व जनपद मे अपने अपने कार्यो के संपादन के साथ ब्रम्ह समाज के प्रति सद्भावना रखने वाले महापुरुषो द्वारा भगवान श्रीपरसुराम जी के द्वारा संपादित किये गये पौराणिक कार्यो पर प्रकाश डालते हुये वर्तमान समय मे भगवान परसुराम जी के बताये मार्ग पर चलने की आवश्यकता पर अपने अपने विचार प्रस्तुत किये
परशुरामजी का उल्लेख रामायण महाभारत भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैह्य वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से 21 बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण गोवा एवं केरल का समावेश है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पिछे धकेलते हुए नई भूमि का निर्माण किया और इसी कारण कोंकण गोवा और केरला मे भगवान परशुराम वंदनीय है तथा तीर के तेज से उत्पन्न ब्राह्मण कॊ ब्रह्मर्षि ब्राह्मण भी कहते है जिसमे बिहार के योद्धा भूमिहार ब्राह्मण महाराष्ट्र के चित्तपावन पंजाब के मोहयाल अपनी उत्तपति भगवान परशुराम से मानते है । वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। अधिवक्ता कीर्ति निधि पांडेय ने कहा कि परशुराम जी सारी सृष्टि पशु पक्षियों वृक्षों फल फूल और समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है, वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो 8 वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे।उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण उनके जाने-माने शिष्य थे। दयानंद शुक्ल, संस्थापक राघवराम तिवारी , अध्यक्ष नंद कुमार मिश्र, महामंत्री कुमुदेश शुक्ल, कोषाध्यक्ष केएम पांडे, वासुदेव प्रसाद शुक्ल, मनमोहन तिवारी, ब्रज लाल मिश्र, शरद बाजपेई, मोहन बाजपेई, प्रभात शुक्ल आदि ने भगवान परशुराम के मार्ग पर चल कर समाज को आगे बढाने की अपील की। स्पीच में विश्व रिकार्ड बनाने वाले यतीश चंद्र शुक्ल, समाज सेवी निधि मिश्रा व उनके पिता , अभिषेक रमन मिश्रा को वाणिज्य कर अधिकारी के पद पर चयनित होने, रश्मि बाजपेई, जेएन अवस्थी, ब्रज लाल मिश्र, मोहन बाजपेई को एक एक कक्ष निर्माण करवाने के लिए सम्मानित किया गया। नवीन कक्षों का लोकार्पण शरद बाजपेई व उनकी पत्नी रश्मि बाजपेई ने किया।
इस अबसर पर भव्य भण्डारे का आयोजन भी किया गया। अब ब्राह्मण धर्मशाला में छह कक्ष निर्मित हो गए है। परिसर में करीब बारह हजार वर्ग फिट भूमि है।
आदेश शर्मा
लखीमपुर खीरी। परशुराम जन्मोत्सव प्रगतिशील ब्राह्मण महासभा द्वारा ब्राह्मण धर्मशाला में आयोजित किया गया।
सर्व प्रथम सभी व्रम्ह वंधुओं द्वारा भगवान श्री परशुराम का पूजन अर्चन किया गया
तत्पश्चात कार्यक्रम मे आये ब्रम्ह समाज के बिचारकों मनीषियों व देश व जनपद मे अपने अपने कार्यो के संपादन के साथ ब्रम्ह समाज के प्रति सद्भावना रखने वाले महापुरुषो द्वारा भगवान श्रीपरसुराम जी के द्वारा संपादित किये गये पौराणिक कार्यो पर प्रकाश डालते हुये वर्तमान समय मे भगवान परसुराम जी के बताये मार्ग पर चलने की आवश्यकता पर अपने अपने विचार प्रस्तुत किये
परशुरामजी का उल्लेख रामायण महाभारत भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट हैह्य वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से 21 बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण गोवा एवं केरल का समावेश है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पिछे धकेलते हुए नई भूमि का निर्माण किया और इसी कारण कोंकण गोवा और केरला मे भगवान परशुराम वंदनीय है तथा तीर के तेज से उत्पन्न ब्राह्मण कॊ ब्रह्मर्षि ब्राह्मण भी कहते है जिसमे बिहार के योद्धा भूमिहार ब्राह्मण महाराष्ट्र के चित्तपावन पंजाब के मोहयाल अपनी उत्तपति भगवान परशुराम से मानते है । वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। अधिवक्ता कीर्ति निधि पांडेय ने कहा कि परशुराम जी सारी सृष्टि पशु पक्षियों वृक्षों फल फूल और समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है, वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा जो 8 वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे।उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण उनके जाने-माने शिष्य थे। दयानंद शुक्ल, संस्थापक राघवराम तिवारी , अध्यक्ष नंद कुमार मिश्र, महामंत्री कुमुदेश शुक्ल, कोषाध्यक्ष केएम पांडे, वासुदेव प्रसाद शुक्ल, मनमोहन तिवारी, ब्रज लाल मिश्र, शरद बाजपेई, मोहन बाजपेई, प्रभात शुक्ल आदि ने भगवान परशुराम के मार्ग पर चल कर समाज को आगे बढाने की अपील की। स्पीच में विश्व रिकार्ड बनाने वाले यतीश चंद्र शुक्ल, समाज सेवी निधि मिश्रा व उनके पिता , अभिषेक रमन मिश्रा को वाणिज्य कर अधिकारी के पद पर चयनित होने, रश्मि बाजपेई, जेएन अवस्थी, ब्रज लाल मिश्र, मोहन बाजपेई को एक एक कक्ष निर्माण करवाने के लिए सम्मानित किया गया। नवीन कक्षों का लोकार्पण शरद बाजपेई व उनकी पत्नी रश्मि बाजपेई ने किया।
इस अबसर पर भव्य भण्डारे का आयोजन भी किया गया। अब ब्राह्मण धर्मशाला में छह कक्ष निर्मित हो गए है। परिसर में करीब बारह हजार वर्ग फिट भूमि है।

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