चुनाव अब धर्म के नाम पर लड़े जाने लगे हैं.....
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विकास के बजाय अब धर्म के नाम पर होते हैं चुनाव
लखनऊ (सं)। किसी भी देश में जब भी चुनाव होते हैं तो सबसे अहम मुद्दा होता है विकास का। हमारे देश में भी पहले चुनाव विकास के ही मुद्दे पर होते थे। लेकिन अब स्वरूप बदल चुका है। यहां चुनाव में विकास की जगह अब धर्म ने ले ली है। इसका सुबूत नेताओं की बिगड़ी हुई वाणी है। हर नेता हिन्दू और मुसलमान को लड़ाकर वोट पाना और चुनाव जीतना चाहता है। कुल मिलाकर यह कहा जाये कि भारत में होने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव अब विकास के मुद्दे से हटकर धार्मिक मुद्दों पर लड़ा जा रहा है। इसमें दोष भी सभी राजनीतिक पार्टियों का है। चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो या फिर कांग्रेस और या समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी। यह चारों बड़ी पार्टियां वोटरों से धर्म और जाति के नाम पर वोट बटोरने के कवायद में जुटी हैं। जबकि चुनाव में सबसे अहम सिर्फ और सिर्प विकास होना चाहिये। यह राजनीतिक पार्टियां कभी इस्लामिक आतंकवाद तो कभी भगवा आतंकवाद को मुद्दा बना लेती हैं। वहीं देश की भोली भाली जनता भी इनके बहकावे में बड़ी ही आसानी से आ जाती है। जनता भी कभी धर्म और जाति से ऊपर नहीं उठ पाती और चालाक नेताओं के कहने पर धर्म के नाम पर वोट दे आती हैं। देश में जब भी कभी चुनाव होते हैं तो वो विकास के मुद्दे पर लड़े जाते थे, लेकिन यहां के चुनाव अब धर्म के नाम पर लड़े जाने लगे हैं। इस विषय पर जब हमने शहर की जनता से उनकी राय मांगी तो उन्होंने इसको पूरी तरह गलत ठहराते हुए कहा कि यह बात सही है कि नेता कभी एकता नहीं चाहते और वो हमेशा चुनाव में लोगों को धर्म और जाति के नाम पर भड़ाकर वोट वसूल लेते हैं और फिर जनता को पांच साल तक कभी महंगाई तो कभी आतंकवाद में उलझाकर छोड़ देते हैं।
कुंवर जय सिंह ने कहा कि यह तो हमारे देश के लोगों को सोचना चाहिये कि कब तक हम ऐसे ही नेताओं के बहकावे में आते रहेंगे और कब तक धर्म के नाम पर लड़कर उनको इसी तरह से वोट देकर सत्ता के शीर्ष पर बैठाते रहेंगे। हालांकि हमारे पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है कि हम इस परम्परा को तोड़े और कोई नई सोच वाली पार्टी को चुनें।
राकेश कुमार ने कहा कि पहले चुनाव में रोटी कपड़ा और मकान मुद्दा होता था, लेकिन अब उसकी जगह धर्म ने ले ली है। धर्म के नाम पर वोट बटोरे जाते हैं। देश का चुनाव अब गरीबों की मदद, शिक्षा में सुधार, बिजली, पानी और सड़क बनाने के वादे से नहीं बल्कि मंदिर मस्जिद के नाम पर हो रहे हैं। ऐसा चलता रहा तो देश तरक्की नहीं बल्कि और पिछड़ता जायेगा।
रवि गौतम कहते हैं कि यह राजनीतिक पार्टियां कभी इस्लामिक आतंकवाद तो कभी भगवा आतंकवाद को मुद्दा बना लेती हैं। विकास जोकि सबसे अहम मुद्दा है उससे हमें बहका दिया जाता है। सच है कि चुनाव अब विकास के नाम पर नहीं बल्कि धर्म के नाम पर होने लगे हैं। सभी पार्टियां इसी तरह से हमारा फायदा उठाती हैं और फिर हमी को भूल जाती हैं।
समाज सेवी जे पी द्विवेदी कहते हैं कि धर्म और जाति के नाम पर चुनाव लडऩा हमारे देश की परम्परा बन चुकी है। हर नेता अपनी बिरादरी से अपनी जाति के नाम पर वोट मांगते हैं और पार्टियां भी हिन्दू और मुसलमान तक सीमित होकर रह गयी हैं। बीजेपी हिन्दुओं के सहारे तो कांग्रेस मुसलमानों के वोट के दम पर जीतना चाहती हैं। चुनाव अपने अहम मुद्दो से हटकर इसी पर हो रहे हैं।
महमूद आलम शाह ने बताया कि हमेशा उम्मीदवार यही कहकर वोट मांगता है कि आपके धर्म और आपकी जाति का वोट बहत आवश्यक है। इसी से जीत हार तय होती है। जब चुनाव हो जाते हैं तो वो भूलकर भी उस धर्म और जाति के लोगों का कल्याण नहीं करते। लेकिन हम उनके बहकावे में आसानी से आकर उनको वोट दे देते हैं। यह बात सही है कि चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं बल्कि धर्म को मुद्दे पर होने लगे हैं।
इजहार अहमद ने कहा कि चुनाव का सबसे अहम मुद्दा तो विकास और आपसी भाईचारा होना चाहिये। लेकिन इसी को मुद्दा नहीं बनाया जाता। मुद्दा बनाया जाता है धर्म, जाति, मंदिर और मस्जिद को। नेता एक दूसरे धर्म पर आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाते हैं। जबकि आतंकवाद को तो कोई दीन धर्म ही नहीं होता है। नेता हमको बहका देते हैं और हम उनकी बातों में आ भी जाते हैं।

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