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राहुल में पीएम का अक्स देखती है अमेठी

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मुख्य मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस
लखनऊ। देश भर की लोकसभा सीटों में जो रुतबा अमेठी का है वह शायद किसी और का नहीं। इसकी वजह है गांधी-नेहरू परिवार। देश की सबसे बड़े राजनीतिक परिवार ने अगर अमेठी को अपनी कर्मभूमि बनाई है तो यहां की जनता ने भी उन्हें अपना लिया है। राजीव गांधी हों, सोनिया हों या फिर राहुल। अमेठी ने कभी इन्हें निराश नहीं किया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से तो यहां के लोंगो की उम्मीदें बहुत बढ़ गईं। उन्हें हर बार ऐसा लगता है कि वह भावी प्रधानमंत्री को वोट करने जा रहे हैं। अमेठी राहुल को इसी उम्मीद से लोकसभा में भेज रही है। इस बार चुनावी समीकरण की बात करें तो मुकाबला राहुल बनाम भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी के बीच ही है। हालांकि पिछले चुनाव में हार-जीत का अंतर बहुत ज्यादा न होने व इस बार राहुल के दो जगह से चुनाव लडऩे को लेकर भाजपा कांग्रेस पर हमलावर है। लेकिन बुधवार को राहुल के रोड शो ने अमेठी में फिर एक बार अपनी धमक दिखाकर भाजपा की रणनीति पर पानी फेर दिया है।
पिछले चार चुनाव से अमेठी पर लगातार गांधी परिवार का कब्जा है। विपक्ष में चाहे जो प्रत्याशी रहता है लेकिन परिणाम पहले से ही लगभग तय रहता है। हालांकि पिछले चुनाव में मोदी लहर में राहुल की जीत का अंतर थोड़ा कम जरूर हुआ लेकिन चुनाव परिणाम कांगे्रस के पक्ष में रहा। 2019 में राहुल गांधी के दो जगह से चुनाव लडऩे पर भाजपा इसे मुद्दा बनाकर गांधी परिवार की संभावित हार से जोड़ रही है। लेकिन बुधवार को अमेठी की जनता ने तीन किमी लम्बा राहुल का नामांकन जुलूस निकाल कर भाजपा जवाब दे दिया है कि वह राहुल के साथ है। अब यह वोट में परिवर्तित होगा या नहीं यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेंगे।
अमेठी के इतिहास पर नजर डाले तो आपातकाल के बाद हुये 1977 के चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर में यह सीट जनता पार्टी की झोली में गयी और 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के पक्ष चली हवा ने यहां भाजपा को कामयाबी दिलायी। मगर इन दो चुनावों को छोड़ कर हर चुनाव का परिणाम कांग्रेस के पक्ष में गया यहां तक कि 2014 की मोदी लहर में भी यह सीट कांग्रेस के खाते में बनी रही। अमेठी लोकसभा सीट 1951-52 में हुए देश के पहले चुनाव के वक्त अस्तित्व में नहीं थी। तब यह इलाका सुल्तानपुर दक्षिण लोकसभा सीट का हिस्सा था जहां से कांग्रेस के बालकृष्ण विश्वनाथ केशकर सांसद बने थे। 1957 में यह क्षेत्र मुसाफि रखाना लोकसभा सीट का हिस्सा बना। केशकर उस बार भी यहां के सांसद बने। 1962 में भी यह सीट कांग्रेस के खाते में गयी। अमेठी के राजा रणंजय सिंह सांसद बने थे। 1967 में अमेठी लोकसभा सीट अस्तित्व में आयी। अब तक 13 बार देश में 16 बार आम चुनाव और दो बार 1981 और 1991 में उपचुनाव हुये। पहला उपचुनाव कांग्रेस के संजय गांधी के निधन और दूसरा उपचुनाव राजीव गांधी के निधन के बाद कराना पड़ा। दोनों उपचुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी जीते संजय गांधी की जगह राजीव गांधी और राजीव गांधी की जगह सतीश शर्मा चुनाव जीते। 1977 और 1998 के चुनाव को छोड़ दें तो 13 आम चुनावों में से 11 के परिणाम कांग्रेस के पक्ष में रहे इनमें भी आठ बार गांधी परिवार के कोई न कोई सदस्य यहां से निर्वाचित हुये। 
इससे पहले के चुनावों में बसपा भी एक कोण होती थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी उम्मीदवार दिया था। कवि राजनेता डॉ. कुमार विश्वास को उसने पूरे दम-खम के साथ यहां उतारा था। हालांकि विश्वास को केवल 2.92 फीसदी वोट मिले थे और वह अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे। बसपा तीसरे नंबर पर रही थी और उसे 6.6 फीसदी वोट मिले थे तब भी मुख्य मुकाबला कांग्रेस-भाजपा के बीच ही था। 
सपा रायबरेली जहां से पहले इंदिरा गांधी सांसद थीं और अब सोनिया गांधी हैं के साथ-साथ अमेठी सीट पर भी अपना उम्मीदवार नहीं देती है। 2019 के चुनाव में सपा से गठबंधन होने के कारण बसपा भी इस बात पर राजी हो गयी है कि महागठबंधन की ओर से अमेठी सीट पर कोई उम्मीदवार नहीं दिया जायेगा लिहाजा इस बार भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने होगी।  

अमेठी का प्रमुख जातीय समीकरण
ओबीसी करीब 22 फीसदी 
मुसलमान करीब 20 फीसदी
अनुसूचित जाति 15 फीसदी
ब्राह्मण करीब 12 फीसदी
क्षत्रिय करीब 11 फीसदी
अन्य मतदाता करीब 20 फीसदी
अमेठी लोकसभा सीट पर मतदाता
करीब 18 लाख 67 हजार
पुरुष : करीब 9 लाख 45 हजार
महिला :करीब 09 लाख 22 हजार
विधानसभा में किसका सिक्का
अमेठी-सदर विधायक गरिमा सिंह (भाजपा)
गौरीगंज-राकेश प्रताप सिंह (सपा) 
जगदीशपुर- सुरेश पासी (भाजपा)
तिलोई- मयंकेश्वर शरण सिंह (भाजपा)

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