न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की प्रासंगिकता
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(8 जनवरी, 2021 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित प्रीतम सिंह एवं श्रुति भोगल के आलेख ‘मिसअंडरस्टैंडिंग दी एमएसपी’ का संक्षिप्त हिंदी रूपान्तर)
हाल ही में लागू कृषि कानूनों के सम्बन्ध में बहुत सारे विवादित मुद्दों में से एमएसपी के मुद्दे को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा कहा जा सकता है, जिसके बारे में सरकार का रवैया कुछ ज्यादा ही अस्पष्ट तथा विरोधाभासों से परिपूर्ण रहा है.
एमएसपी पर आधारित, फसलों की सार्वजनिक एवं पक्की समय सीमा के अन्दर खरीद व्यवस्था – तीनों मिलकर एक पैकेज डील का निर्माण करते हैं. अगर इनमें से किसी एक पहलू को छोड़ दिया जाय, तो पूरा का पूरा सिस्टम निष्फल हो जाता है. उदाहरण के लिए, यदि एमएसपी की व्यवस्था तो जस की तस रहे, लेकिन फसल की खरीद व्यवस्था उपलब्ध न हो, तो समर्थन मूल्य का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है. इसी प्रकार, समर्थन मूल्य तथा खरीद व्यवस्था के उपलब्ध होते हुए समय सीमा के अन्दर खरीद की व्यवस्था काम न करे, तब भी सिस्टम प्रभावशाली नहीं रह पायेगा, खासकर तब जब बिक्री योग्य उत्पाद सड़ने वाले हों. ऐसी स्थिति में किसान अपने उत्पादों को जानवरों तक को को खिलाने के लिए मजबूर हो जाते हैं.
हरित क्रांति की शुरुआत में इस व्यवस्था को इसलिए लागू किया गया था ताकि किसान वर्ग अधिक से अधिक अनाज का उत्पादन कर सके. इनमें गेंहू और चावल मुख्य थे, जिससे कि देश खाद्यान्न के मामले में आत्म निर्भर हो जाय. फिर जब देश को अनाज के आयात से मुक्ति मिल गयी, तब एमएसपी तथा मंडियों की व्यवस्था के दो उद्देश्य सामने आ गए. पहला उद्देश्य तो खाद्यान्न के मामले में आत्म निर्भरता ही बनी रही, क्योंकि बाढ़, सूखा तथा फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली बीमारियों के मद्देनजर अनाज की पर्याप्तता पर हमेशा ही सवालिया निशान लगा रहा. दूसरा उद्देश्य यह रहा – जो कि कम महत्वपूर्ण नहीं था कि किसान वर्ग को फसलों के वाजिब तथा गारंटीशुदा दाम मिलते रहें. यह जो दूसरा उद्देश्य है, वह ख़ास तौर पर छोटे एवं मझोले किसानों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, जो संख्या के हिसाब से भारत के किसान परिवारों के 86 प्रतिशत बैठते हैं. उनको फसल काटने के तुरंत बाद अपनी फसल के दाम खड़े करने पड़ते हैं. तमाम अर्थशास्त्री, जो एमएसपी की व्यवस्था को समाप्त कर देने की वकालत करते हैं, क्योंकि अब भारत खाद्यान्न के मामले में आत्म निर्भर हो चुका है, तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए आवश्यकता से अधिक अनाज के भण्डार जमा होने लगे हैं, इन दोनों उद्देश्यों के महत्त्व को कम करके आंकते हैं.
सरकार द्वारा जिस तरह से एमएसपी की घोषणा की जाती है, तथा जिस प्रकार उसका क्रियान्वयन किया जाता है, वह दोषयुक्त है. कुल 23 फसलों के लिए समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है, लेकिन समय बद्ध तरीके से खरीद केवल दो फसलों की ही की जाती है. शेष 21 फसलों के समर्थन मूल्य का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है. वर्ष 2019-20 के दौरान ज्वार का समर्थन मूल्य 1,760/- रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया गया था, लेकिन किसानों को बिहार में 1,250/, हरियाणा में 1,000-1,200/- तथा कर्णाटक में 1,100/- प्रति क्विंटल के हिसाब से औसत दाम मिले थे. इसलिए, किसान संगठनों ने ठीक ही बाकी की 21 फसलों के लिए भी सम्पूर्ण एमएसपी पैकेज की मांग की है.
एमएसपी की परिभाषा के सम्बन्ध में भी अच्छा खासा विवाद है. किसान संगठनों ने एम एस स्वामीनाथन फार्मूला के क्रियान्वयन की मांग की है, जिसका कि बीजेपी ने 2014 के अपने चुनाव घोषणापत्र में उल्लेख किया था. लेकिन सत्ता में आने के बाद बीजेपी अपने घोषित वायदे से मुकर गयी थी. किसान वर्ग बीजेपी की उस वादा-खिलाफी का हवाला देता है, तथा एमएसपी को लेकर सरकार के ‘आश्वासन’ पर भरोसा नहीं करता है. सरकार के बेतुकेपन की तो तब हद हो जाती है जब वह यह दावा करती है कि उसने तो एम एस स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों का क्रियान्वयन पहले ही कर दिया है.
इसलिए इस विवादास्पद मुद्दे पर तथा कृषि कानूनों के अन्य प्रावधानों पर सावधानीपूर्वक विचार किया जाना चाहिए, और जल्दबाजी में संशोधनों पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए. किसानों की इस मान्यता में दम है कि इन कानूनों को निरस्त किया जाय
अनुवाद-अशोक गर्ग

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