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भागवत कथा में रासलीला का प्रसंग सुनकर भक्तगण हुए भाव विभोर

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रिपोर्ट सुशील कुमार द्विवेदी इटियाथोक गोंडा

ग्राम पंचायत सेखुई के धर्म मिश्र पुरवा में श्रीमद्भागवत कथा के सातवे दिन रविवार को सरलमूर्ति स्वामी श्री लक्ष्मीनारायणाचार्य जी महाराज ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का प्राण रासलीला है। इसका चिंतन करना चाहिए, न कि अनुकरण। शुद्ध जीव का पूर्ण ब्रह्मा के साथ विलास ही रासलीला है।
स्वामी जी ने कहा कि रासलीला में आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। रासलीला का चिंतन करने से काम वासना नष्ट हो जाती है। उन्होंने कहा कि ये ब्रज की स्त्रियां अपनी इंद्रियों के द्वारा निरंतर भक्ति रस का पान करती थीं, इसलिए इनको गोपी कहा जाता है। इनमें साधना सिद्धा, ऋषिरूपा, धुतिरूपा, स्वयं सिद्धा, अन्यपूर्वा, अनन्य पूर्वा ऐसी कितनी प्रकार गोपियां रासलीला में श्रीकृष्ण के साथ नृत्य कर रही थी। इनकी भावना, कल्पना, आरोपण, वियोगावस्था की स्थिति थी न कि संयोगावस्था की। रासलीला में कृष्ण के साथ गोपियों का मिलन विजातीय तत्वों का, स्त्रीत्व व पुरुषत्व का मिलन न होकर अंश और अंशी का मिलन था। संसारिकता से ऊपर उठकर कृष्णोपलब्धि करना ही मानव मात्र का धर्म है। उन्होंने कहा कि आत्मचिंतन से प्रेमोपलब्धि होती है, जबकि शरीर का चिंतन करने से मोहोपलब्धि होती है। प्रेम में पागल बने बिना परमात्मा नहीं मिल पाते।

उन्होंने कहा कि रासलीला के समय श्री कृष्ण गृहीत मनसा गोपियां, कृष्ण विरह में रोने लगी। उनके चित्त में महाभाव की स्थिति प्रकट हो गई। राग, अनुराग, भाव, महाभाव, अधिरुढ़ महाभाव, मोदन, मादन आदि सभी भाव मूर्तिमान हो गए। प्रणय, स्नेह, मान और अनेक अन्य अवस्थाएं जो प्रेम की होती हैं, उनमें परिलक्षित होने लगीं। गोपियां भगवान की ऐसी भक्त हैं, जिनके चरणों में लगी धूल की वंदना महाज्ञानी उद्धव जी ने किया। रासलीला में सारी लीला बिंब-प्रतिबिंब न्याय से हुई है। उन्होंने कहा कि जब-जब भगवान का अवतरण होता है तो भगवती का भी अवतरण हुआ करता है। पूर्ण ब्रह्मा कृष्ण है, तो उनकी अनुयायिनी शक्ति रुक्मिणी जी हैं।

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