इंसाफ दिलाने वाली पुलिस,नाइंसाफी का शिकार मुख्यमंत्री ने दिए जांच के आदेश
HTN Live
Bureau Chief Uttar Pradesh
यूपी पुलिस की आंतरिक व्यवस्था के तहत वर्षो से पीएसी के उच्च शिक्षा प्राप्त या 40 वर्ष उम्र पर पीएसी सिपाही जनपद की सशस्त्र पुलिस शाखा में जाते थे।जिसका मुख्य उद्देश्य पीएसी की कठिन ड्यूटी के बाद सिविल पुलिस की अपेक्षाकृत आरामदायक डयूटी में भेजना था।वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश साशन ने पुलिस सम्बर्ग समीक्षा कर उसे दो सम्बर्ग सिविल पुलिस व पीएसी/सशस्त्र पुलिस में विभाजित किया तथा निर्णय लिया गया कि जो लोग पीएसी से जनपदीय सशस्त्र पुलिस में आये थे उन्हें सिविल पुलिस में मर्ज कर दिया जाय।मर्जर के बाद लगभग 918 पीएसी कर्मी सिविल पुलिस में मान लिए गए तथा इनको सिविल पुलिस में मुख्य आरक्षी/उपनिरीक्षक पद पर सीनियरिटी के आधार प्रोन्नति दे दी गयी।इनके सापेक्ष पीएसी में रिक्त 918 पदों पर नई नियुक्ति भी कर ली गयी है।
एडीजी स्थापना ने बिना पीएसी प्रमुख से सम्बाद किये एवम बिना उनकी सहमति के इन 918 पुलिस कर्मियों को पदावनत कर पीएसी वापस कर दिया गया,जहा बर्तमान में इनके सापेक्ष आरक्षी के पद रिक्त ही नही है।मजबूरन यह सभी सिपाही उच्च न्यायालय की शरण मे गए है।
एडीजी स्थापना की गलत नीतियों के कारण पुलिस और पीएसी के इंस्पेक्टरों के डिप्टी एसपी पद पर परमोशन प्रक्रिया की कोई नीति निर्धारित नही हो सकी है और दर्जनो केस उच्च न्यायालय में लम्बित है।नियमो के विपरीत सैकड़ो आउट ऑफ टर्न प्राप्त इंस्पेक्टरों को डिप्टी एसपी पर परमोशन दे दिया गया।आज भी यह नीति निर्माणाधीन ही है,कोई स्पस्ट नीति नही है।पुलिस आला अफसरों की गलत नीतियों एवम निर्णयों से एक तरफ जहां जवानों में रोष व्याप्त हैं, वही दूसरी ओर पुलिस कर्मी विभाग से न्याय न पाकर मजबूरन न्यायालय का दरवाजा खटखटा रहे हैं और अनावश्यक रूप से न्यायपालिका पर केसो का भार बढ़ रहे हैं।
मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश का पुलिस प्रमोशन को लेकर कड़ा रुख अख्तियार करने और जांच कर जबाबदेही तय करने के आदेश से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गई है।योगी राज में कानून का राज कायम करने वाली पुलिस के अपने ही अधिकारी उनके अधिकार छीन रहे है,जिनकी रक्षा के लिए स्वयं मुख्यमंत्री को आगे आना पड़ा।


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