पीलीभीत पर तो भाजपा के 'गांधीÓ का ही राज
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1991 से मेनका व वरुण की विरासत को संजोये
यहां की जनता ने दूसरे दलों को नकारा
मोहम्मद शानू
लखनऊ। देश की कुछ सीटें ऐसी हैं जहां पर सिर्फ नाम चलता है। उस नाम के पीछे हजारों नहीं लाखों लोग आंख मूद कर चलने लगते हैं। ऐसी ही एक सीट है पीलीभीत। यहां आज भी भाजपा के गांधी यानी वरुण या मेनका गांधी का ही राज चलता है। परिस्थितियां चाहें जो भी रही हों मगर यहां के लोग अपने नेता के साथ कदमताल करते
आये हैं। यही कारण है कि 1991 से यहां मेनका व वरुण गांधी की ही विरासत मजबूत गढ़ के रूप में स्थापित है। अपने बेबाक बयानों से हमेशा चर्चा में रहने वाले गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी पर भाजपा ने एक बार फिर पीलीभीत से चुनाव मैदान में उतारा है और खुद सुल्तानपुर की ओर रुख किया है। पीलीभीत में वरुण का मुकाबला गठबंधन के प्रत्याशी पूर्व मंत्री हेमराज वर्मा से माना जा रहा है।
1989 से पीलीभीत की सियासत में दस्तक देने वाली मेनका गांधी ने लोकसभा चुनाव में एक बार फिर अपनी सीट बदल दी है। इस बार वह सुल्तानपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ेंगी। सुल्तानपुर से वर्तमान में उनके बेटे वरुण गांधी सांसद हैं। वहीं वरुण अब मां की राजनीतिक विरासत पीलीभीत में चुनावी मैदान में हैं। ऐसा दूसरी बार हुआ है जब बेटे के लिए मां ने अपनी पसंदीदा लोकसभा सीट पीलीभीत छोड़ी है।
गांधी परिवार से होने के बावजूद कांग्रेस विरोध की राजनीति में वरुण गांधी बड़ा नाम हैं। वह भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार हैं। उन्होंने चुनाव मैदान में कभी मात नहीं खाई। हालांकि कांग्रेसी राजनीति से इतर रहते हुए राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा मुकाम पाने का इंतजार अब भी वरुण गांधी को है। इस आम चुनाव में भाजपा ने उन्हें पीलीभीत सीट से उम्मीदवार बनाया है। वह 2009 में पीलीभीत से सांसद रह चुके हैं। 2014 में उन्होंने सुलतानपुर से चुनाव जीतकर लोकसभा में कदम रखा था।
पीलीभीत लोकसभा सीट के संसदीय इतिहास की बात करें तो 1951 में लोकसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस ने यहां से जीत हासिल की हो लेकिन उसके बाद 1957, 1962, 1967 के चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की थी। 1971 में कांग्रेस को फिर से यहां पर जीत मिली लेकिन 1977 में चली सरकार विरोधी लहर में कांग्रेस की करारी हार हो गई। 1980 और 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर यहां से बड़ी जीत हासिल की लेकिन उसके बाद कांग्रेस यहां कभी वापसी नहीं कर सकी। संजय गांधी की मौत के बाद गांधी परिवार से अलग हुई मेनका गांधी ने 1989 में जनता दल के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ा और जीता लेकिन दो साल बाद 1991 में हुए चुनाव में भाजपा ने यहां से जीत की शुरुआत की। मेनका गांधी ने 1996 से 2004 तक लगातार चार बार यहां से चुनाव जीता। इनमें दो बार निर्दलीय और 2004 में भाजपा के टिकट से चुनाव में जीत हासिल की थी। 2009 में उन्होंने अपने बेटे वरुण गांधी के लिए यह सीट छोड़ दी और वरुण यहां से सांसद चुने गये। 2014 में एक बार फि र वह यहां वापस आईं और छठीं बार यहां से सांसद चुनी गईं।
जातीय समीकरण पर बात करें तो पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र में हिंदू वोटरों के साथ-साथ मुस्लिम वोटरों का भी खास प्रभाव है। पीलीभीत में 71 प्रतिशत आबादी हिंदू और 24 प्रतिशत आबादी मुस्लिम समुदाय की है। 2014 के चुनाव में पीलीभीत में 16 लाख से अधिक वोटर थे जिनमें 9 लाख पुरुष और 7 लाख से अधिक महिला मतदाता शामिल हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में 5 विधानसभा सीटें बहेड़ी, पीलीभीत, बडख़ेड़ा, पूरनपुर और बिसालपुर शामिल हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में सभी पांच सीटों पर भाजपा ने ही बाजी मारी थी।
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