जातिवाद के इस दौर में भी प्रेरणा देती हैं शूरवीर महाराणा प्रताप की सैकड़ो वर्ष पुरानी सोशल इंजीनियरिंग।।
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महाराणा प्रताप को भारतीय इतिहास में वीर योद्धा और साहसी शासक के रूप जाना जाता है। हिन्दू पंचांग विक्रम सम्वत के अनुसार उनकी जयंती हर साल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है और अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार 9 मई, 1540 की तारीख है। महाराणा प्रताप राजपूतों में सिसोदिया वंश के वंशज थे, महाराणा प्रताण को कभी भी मुगलों के आगे झुकना मंजूर नहीं था उनकी छोटी-सी सेना होने के वावजूद उन्होने शत्रुओं को नाकों चने चबवा दिए थे।
सोशल इंजीनियरिंग के जनक
पिछले साल सहारनपुर उत्तरप्रदेश में महाराणा की जयंती पर जिस प्रकार से दलित और राजपूत समुदाय आमने सामने हुए उसे देखकर महाराणा की आत्मा को बेहद कष्ट पहुँचा होगा, राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए जाति धर्म के आधार पर लोगो को लड़ाने वालो को महाराणा प्रताप के जीवन से सबक लेना चाहिए। महाराणा आज से साढ़े चार सौ साल पहले भील-क्षत्रिय एकता के सिद्धांत के शिल्पकार थे, प्रताप का घोष था भीली जायो-राणी जायो भाई-भाई! जिसका मतलब हैं भीलों और राजपूतो के पुत्र आपस में भाई-भाई हैं, यह सोच थी एक राजपूत राजा की, यहाँ तक की वह अपने फैसले भी भीलों के बीच बैठकर लिया करते थे। भीलों के साथ प्रताप के साथ जैसा रहा, वैसा अन्य किसी शासक का नहीं रहा। अकबर से हारा इलाका उन्होंने इन्ही भीलों की सेना बनाकर वापस दुबारा जीत लिया था।
महिला सम्मान और रहीम के साथ प्रताप का बर्ताव और जहांगीर का बर्ताव
अब्दुल रहीम खानखाना अकबर का मुख्य सिपहसालार था। वह अकबर के संरक्षक बैरम खां का काबिल और साहसी पुत्र था और हिन्दी का मशहूर कवि। वह एक सैनिक भी था। एक समय तो रहीम एक टुकड़ी लेकर भी आया और उसने प्रताप पर आक्रमण का एक विफल प्रयास किया, लेकिन ऐसे ही एक समय में रहीम जब सैनिक टुकड़ी के साथ शेरपुर पहुंचा था तो कुंवर अमरसिंह ने उस पर हमला कर दिया था और उनके परिवार के कुछ सदस्यों सहित महिलाओं को बंदी बना लिया।
अमरसिंह इन्हें प्रताप के सामने लेकर आए तो प्रताप ने पुत्र के प्रति नाराजगी जताई और कहा कि कवि के इस परिवार को तत्काल रिहा करो और उनके परिवार की महिलाआें को ससम्मान वापस भेजो। नहीं पता कि रहीम ने इस घटना को उस समय प्रताप का औदार्य समझा या भय, लेकिन उस दिन तो उन्हें मुगल सम्राट अकबर के सामने महाराणा प्रताप वाकई में महामानव और एक महानायक सरीखे लगे जब एक मुगल राजकुमार ने उनके बेटे का सिर काटकर उन्हें थाली में सजाकर भेज दिया।
घटना कुछ इस तरह है कि रहीम जब बूढ़े हो गए तो अकबर के बेटे जहांगीर ने एक छोटी सी नाराजगी पर उनके बेटे दाराब का सिर काटकर उन्हें कहलवा भेजा कि यह खरबूजा आपके इनायत के लिए है! रहीम इस घटना पर फूटफूट कर रोया और प्रताप को याद किया! कहां तो ये मुगल जिनके लिए उन्होंने और उनके पिता ने आजीवन सर्वस्व त्यागा और कहां वह महाराणा प्रताप, जिसने शत्रु होते हुए भी परिवार की महिलाओं को सकुशल वापस भिजवाया और साथ में पकड़े गए लोगों को भी सम्मान लौटाया।
किस्सा दो तलवारे धारण करने का
प्रताप की पहली गुरु मां जयवंता बाई ही थी। प्रताप एक बार अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे। वे एक निहत्थे साथी पर प्रहार किए जा रहे थे। मां ने प्रताप को बुलाया और समझाया-बेटा, शूरवीर जीवन में कभी निहत्थे पर वार नहीं करते। तुम शूरवीर हो। अगर दुश्मन की तलवार टूट भी गई हो तो उसे अपनी तलवार दे दो और युद्ध करो। अवाक प्रताप ने पूछा-मां, मैं अपनी तलवार दे दूंगा तो लड़ूंगा कैसे? इस पर मां बोली-तुम दो तलवार रखना। और इसके बाद प्रताप ने आजीवन दो तलवारें रखीं। ऐसे कई मौके आए, जब शत्रु को अपनी तलवार उन्होंने दी। हल्दीघाटी युद्ध से ठीक पहले जब मानसिंह ने मेवाड़ पर आक्रमण के लिए पूरी सेना के साथ डेरा डाल दिया था तो युद्ध की पहली शाम मानसिंह शिकार के लिए गया। प्रताप को अपने सेना नायकों से सूचना मिली कि क्यों मान सिंह को अभी गिरफ्तार कर लें या फिर आज ही मौत की नींद सुला दें। प्रताप ने साफ मना कर दिया और कहा : उससे तो युद्ध में ही सामना करेंगे।
ये थे राणाप्रताप जिन पर पूरे देश को गर्व होना चाहिए, युद्धकलाये सीख कर सर्वश्रेष्ठ योद्धा तो कोई भी बन सकता हैं पर एक बेहतर इंसान आदमी खुद ही बनता हैं, बेहतर इंसान के साथ सर्वश्रेष्ठ योद्धा के तौर पर महाराणा का राष्ट्र सदैव कृतघ्न रहेगा,
उनकी जयंती पर हमराह एक्स कैडेट एनसीसी सेवा संस्थान की तरफ से ऐसे महान वीर सपूत महान योद्धा महाराणा प्रताप जी की जयंती पर उन्हें नमन करती है
🙏🙏🙏🙏🙏
जे पी द्विवेदी
समाज सेवक
( हमराह एक्स कैडेट एनसीसी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय संयोजक)
महाराणा प्रताप को भारतीय इतिहास में वीर योद्धा और साहसी शासक के रूप जाना जाता है। हिन्दू पंचांग विक्रम सम्वत के अनुसार उनकी जयंती हर साल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है और अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार 9 मई, 1540 की तारीख है। महाराणा प्रताप राजपूतों में सिसोदिया वंश के वंशज थे, महाराणा प्रताण को कभी भी मुगलों के आगे झुकना मंजूर नहीं था उनकी छोटी-सी सेना होने के वावजूद उन्होने शत्रुओं को नाकों चने चबवा दिए थे।
सोशल इंजीनियरिंग के जनक
पिछले साल सहारनपुर उत्तरप्रदेश में महाराणा की जयंती पर जिस प्रकार से दलित और राजपूत समुदाय आमने सामने हुए उसे देखकर महाराणा की आत्मा को बेहद कष्ट पहुँचा होगा, राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए जाति धर्म के आधार पर लोगो को लड़ाने वालो को महाराणा प्रताप के जीवन से सबक लेना चाहिए। महाराणा आज से साढ़े चार सौ साल पहले भील-क्षत्रिय एकता के सिद्धांत के शिल्पकार थे, प्रताप का घोष था भीली जायो-राणी जायो भाई-भाई! जिसका मतलब हैं भीलों और राजपूतो के पुत्र आपस में भाई-भाई हैं, यह सोच थी एक राजपूत राजा की, यहाँ तक की वह अपने फैसले भी भीलों के बीच बैठकर लिया करते थे। भीलों के साथ प्रताप के साथ जैसा रहा, वैसा अन्य किसी शासक का नहीं रहा। अकबर से हारा इलाका उन्होंने इन्ही भीलों की सेना बनाकर वापस दुबारा जीत लिया था।
महिला सम्मान और रहीम के साथ प्रताप का बर्ताव और जहांगीर का बर्ताव
अब्दुल रहीम खानखाना अकबर का मुख्य सिपहसालार था। वह अकबर के संरक्षक बैरम खां का काबिल और साहसी पुत्र था और हिन्दी का मशहूर कवि। वह एक सैनिक भी था। एक समय तो रहीम एक टुकड़ी लेकर भी आया और उसने प्रताप पर आक्रमण का एक विफल प्रयास किया, लेकिन ऐसे ही एक समय में रहीम जब सैनिक टुकड़ी के साथ शेरपुर पहुंचा था तो कुंवर अमरसिंह ने उस पर हमला कर दिया था और उनके परिवार के कुछ सदस्यों सहित महिलाओं को बंदी बना लिया।
अमरसिंह इन्हें प्रताप के सामने लेकर आए तो प्रताप ने पुत्र के प्रति नाराजगी जताई और कहा कि कवि के इस परिवार को तत्काल रिहा करो और उनके परिवार की महिलाआें को ससम्मान वापस भेजो। नहीं पता कि रहीम ने इस घटना को उस समय प्रताप का औदार्य समझा या भय, लेकिन उस दिन तो उन्हें मुगल सम्राट अकबर के सामने महाराणा प्रताप वाकई में महामानव और एक महानायक सरीखे लगे जब एक मुगल राजकुमार ने उनके बेटे का सिर काटकर उन्हें थाली में सजाकर भेज दिया।
घटना कुछ इस तरह है कि रहीम जब बूढ़े हो गए तो अकबर के बेटे जहांगीर ने एक छोटी सी नाराजगी पर उनके बेटे दाराब का सिर काटकर उन्हें कहलवा भेजा कि यह खरबूजा आपके इनायत के लिए है! रहीम इस घटना पर फूटफूट कर रोया और प्रताप को याद किया! कहां तो ये मुगल जिनके लिए उन्होंने और उनके पिता ने आजीवन सर्वस्व त्यागा और कहां वह महाराणा प्रताप, जिसने शत्रु होते हुए भी परिवार की महिलाओं को सकुशल वापस भिजवाया और साथ में पकड़े गए लोगों को भी सम्मान लौटाया।
किस्सा दो तलवारे धारण करने का
प्रताप की पहली गुरु मां जयवंता बाई ही थी। प्रताप एक बार अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे। वे एक निहत्थे साथी पर प्रहार किए जा रहे थे। मां ने प्रताप को बुलाया और समझाया-बेटा, शूरवीर जीवन में कभी निहत्थे पर वार नहीं करते। तुम शूरवीर हो। अगर दुश्मन की तलवार टूट भी गई हो तो उसे अपनी तलवार दे दो और युद्ध करो। अवाक प्रताप ने पूछा-मां, मैं अपनी तलवार दे दूंगा तो लड़ूंगा कैसे? इस पर मां बोली-तुम दो तलवार रखना। और इसके बाद प्रताप ने आजीवन दो तलवारें रखीं। ऐसे कई मौके आए, जब शत्रु को अपनी तलवार उन्होंने दी। हल्दीघाटी युद्ध से ठीक पहले जब मानसिंह ने मेवाड़ पर आक्रमण के लिए पूरी सेना के साथ डेरा डाल दिया था तो युद्ध की पहली शाम मानसिंह शिकार के लिए गया। प्रताप को अपने सेना नायकों से सूचना मिली कि क्यों मान सिंह को अभी गिरफ्तार कर लें या फिर आज ही मौत की नींद सुला दें। प्रताप ने साफ मना कर दिया और कहा : उससे तो युद्ध में ही सामना करेंगे।
ये थे राणाप्रताप जिन पर पूरे देश को गर्व होना चाहिए, युद्धकलाये सीख कर सर्वश्रेष्ठ योद्धा तो कोई भी बन सकता हैं पर एक बेहतर इंसान आदमी खुद ही बनता हैं, बेहतर इंसान के साथ सर्वश्रेष्ठ योद्धा के तौर पर महाराणा का राष्ट्र सदैव कृतघ्न रहेगा,
उनकी जयंती पर हमराह एक्स कैडेट एनसीसी सेवा संस्थान की तरफ से ऐसे महान वीर सपूत महान योद्धा महाराणा प्रताप जी की जयंती पर उन्हें नमन करती है
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जे पी द्विवेदी
समाज सेवक
( हमराह एक्स कैडेट एनसीसी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय संयोजक)


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