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जब भी कोई पूछता कि यह क्या है? बड़े ही शांत स्वभाव से जवाब देता "मेरी माँ" है

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17 साल के सरोज को उसकी 45 साल की माँ के मरने के बाद गाँव के किसी एक ने भी कन्धा नहीं दिया और वह थक हार कर खुद साइकिल पर माँ की अर्थी बनाकर अंतिम संस्कार करने निकल पड़ा.

हाँ इसलिए कि वह दलित समाज से था, मामला उड़ीसा में एक ज़िला है झारसुगुड़ा. वहां एक गांव है कर्पबहाल. बहुत छोटा सा गांव है.
एक तरफ बाबा साहब का संविधान बराबरी का हक़ देता है जिसकी वजह से रामनाथ कोविंद देश की सबसे बड़ी महामहिम राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठ जाते हैं वहीँ दूसरी तरफ इस नौजवान भारत की माँ को अर्थी देने वाले कंधे नहीं मिलते.
अभी पिछली 17 को रोहित वेमुला की बरसी थी और उसी दिन 17 साल के सरोज को समाज ने दुत्कार दिया कि तुम और तुम्हारी माँ दलित समाज से हो इसलिए कन्धा नहीं दिया जाएगा.
अम्बेडकर के भारत में ऊंच-नीच जबतक रहेगा इसे सोने की चिड़िया कोई नहीं बना सकता है.😢😢

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